Wednesday, April 12, 2023

माँ मुझको दो सुमति सौख्य वर.

 माँ मुझको दो सुमति सौख्य वर.


माँ मुझको दो सुमति सौख्य वर 

महिषासुर माया निपातिनी , 

शुम्भ, निशुम्भासुर सुघातिनी, 

शंख, चक्र, असि, गदा, धनुष शर,

फरसा, वज्र, त्रिशूल, ढाल, कर,

माँ मुझको दो सुमति सौख्य वर.


जया कुण्डिका कीर्तिवारिणी,

माला, घंटा, शक्ति धारिणी,

दण्ड, कमण्डलु, पद्म, पाश वर,

तीन नेत्र मधुपात्र  शूल धर, 

माँ मुझको दो सुमति सौख्य वर 


सिंह वाहिनी सुरति कारिणी,

खल दल दमनी कष्ट हारिणी ,

वैतरणी तम तोम शाप डर ,

कृपा दृष्टि से मिटें पाप खर,

माँ मुझको दो सुमति सौख्य वर 


शम्भुप्रिया सुख सुयश दायिनी,

मन्जुल रूपा अमृत पायिनी,

स्तुति में रत सृष्टि चराचर,

किन्नर, यक्ष, देव, नारी-नर,

माँ मुझको दो सुमति सौख्य वर.


दुर्गा, द्विति घन बीच दामिनी,

चन्द्र छटा में शुभ्र यामिनी,

दुर्गति शमनी छवि अति सुन्दर,

दैहिक, दैविक, भौतिक, दुःख हर,

माँ मुझको दो सुमति सौख्य वर 

 


 



Wednesday, April 5, 2017

श्रीराम नयनाभिराम

श्रीराम नयनाभिराम
श्री सुखधाम के गुण गाइए
सीता पुनीता ज्ञान गीता
ध्यान में रस पाइए

लक्ष्मण शरण मंगल करण
भय शोक रोग मिटाईए
भरत रक्षा करत प्रतिपल
विपुल वैभव पाइए

शत्रुघ्न हैं निर्विघ्नकारक
प्रणत शीश नवाइये
बजरंग अंग सुरंग की
पवन चरण रज पाइए

श्रीराम के दरबार की
झांकी मनोरम ध्याइये
इस भांति कलिमल हरण प्रिय
सुख सम्पदा यश पाइए

Sunday, December 11, 2016

जय श्री गणपति

जय श्री गणपति जयति गणेश
पाहिमाम सुखधाम गणेश

एकदंत गणपति प्रथमेश,
पार्वती के सूत अखिलेश,
मूषक वाहन शुचि परिवेश,
जयति गजानन जय करुणेश.

गणाध्यक्ष चर्चित सर्वेश,
धूम्रकेतु प्रभु पिता महेश
वक्रतुंड, अतिकाय सुरेश,
विघ्नविनाशक जय विमलेश.

विकट इष्ट सुख शांति निवेश,
तम नाशक मुख कान्ति दिनेश
मोदक प्रिय छवि शुभ सन्देश
जयति विनायक जय भुवनेश

बुद्धिनाथ यश कीर्ति प्रवेश
कवि कुलभूषण स्वस्ति अशेष
सुमुख भक्ति चिर शक्ति धनेश
जय गजवदन जयति लग्नेश

कपिल चतुर्भुज कुंचित केश
अंकुश पाश पद्म कर शेष
आशीर्वादक मन्जुल भेष
जय लम्बोदर जयति गणेश

भालचंद्र शोभित गणवेश
रिद्धि सिद्धि सेवित अनिमेष
दयामूर्ति श्री सहित विशेष
हे गजकर्ण हरो सब क्लेश

जय श्री गणपति जयति गणेश
पाहिमाम सुखधाम गणेश


Wednesday, October 5, 2016

पेपर वेट

क्या आप जानते हैं ?
भाग्य के तराजू पर
कर्म  के बांटों से
विभागीय अफसरों द्वारा
डांडी मार कर
तौला गया हूँ -
इसीलिए मेरा सही वज़न
आज तक  किसी को नहीं पता
हाँ, जब भी कोई
नया अफसर आया
मुझे बड़े काम का पाया -
उसने हवा के झोंकों से
अपनी मेज़ के
उड़ते हुए कागज़ों को
मेरे वज़न से दबाया
चूँकि पेपरवेट को कभी
तौला नहीं जाता है
उसे  सिर्फ आवश्यक्ता पड़ने पर
प्रयोग में लाया जाता  है -
इसीलिए अभी तक मेरा
सही मूल्यांकन नहीं हो पाया है 

Saturday, November 24, 2012

हनुमत वन्दन

ज्ञान के निधन भगवान् अंजनी  सपूत ,
क्षण भर में क्षार करें विपदाएं हन्त  की।
ध्यान के वितान श्रीराम के प्रधान दूत,
रोग शोक हरें सभी पीड़ायें  संत की।

ज्ञान के अजान श्रीमान शक्ति में अकूत,
गिरिधर की ख्याति भक्ति चर्चा अनंत की।
गान के विहान हनुमान यश कीर्ति सूत,
दुःख दैन्य दूर करें व्याधि आदि अंत की।

दान में महान सम्मान के सुजान सेतु,
सेवा में लीन सदा सीता के कन्त की।
भान  में प्रधान कांतिवान शुद्ध अवधूत,
वज्र अंग ध्यान मग्न शोभा श्रीमंत की।

यान के समान पवमान के प्रसून पूत,
पल भर में पार करें दूरियां दिगंत की।
मान के निदान स्वाभिमान की सुरक्षा हेतु,
आदि से अनंत है छलांग हनुमंत की।





 

माँ मुझे वरदान दे।

माँ मुझे वरदान दे।

निज भक्ति का,
शिव शक्ति का,
अनुरक्ति का मधुपान दे।

माँ मुझे वरदान दे।

शुभ कर्म का,
ऋषि धर्म का,
श्रुति मर्म का रसगान दे।

माँ मुझे वरदान दे।

शुचि ध्यान का,
रूचि ज्ञान का,
अनुमान का प्रतिमान दे।

माँ मुझे वरदान दे।

तव चित्र का,
चिर  मित्र का,
सुपवित्र का सम्मान दे।

माँ मुझे वरदान दे।

सद्बुद्धि का,
श्री वृद्धि का
सुसम्रिद्धि का अनुदान दे।

माँ मुझे वरदान दे।




 

Saturday, February 26, 2011

एक दिवस जीवन का आज और बीत गया

आदि से अनंत की ओर लिए जाता यह
एक दिवस जीवन का आज और बीत गया

जीवन की राहों में भटक रहे प्राणी को 
गिनी-चुनी श्वांसों का संबल मिल पाटा है 
आशा निराशा लिए दुनिया के झमेलों में 
अनुपम पाथेय प्राण प्यारा लुट जाता है 

पता नहीं चलता कब आयु को चुराता हुआ 
ग्रीष्म और पावस फिर शीतकाल बीत गया 

जीवन के दीपक मैं प्राणों का नेह भरे 
श्वांसो की बाती से दीपित तन पलता है 
ज्योति का प्रकाश पुंज मार्ग के अंधेरों में 
कहाँ साथ छोड़ेगा पता नहीं चलता है 

अंतर की धड़कन को गिन रहा प्रत्येक पल 
क्षण भर का वर्तमान होकर अतीत गया 

जीवन का अमृत-कुण्ड बूँद-बूँद टपक-टपक 
रिसते हुए घट का जल जैसे चुक जाता है 
इन्द्रियों की भूख प्यास तन मन का योगदान 
बिना किसी कोलाहल सभी रुक जाता है 

माया के वशीभूत मोह मद तन्द्रा में 
कोई समझ पाता नहीं जीवन कब रीत गया 

जीवन और मृत्यु का अविराम कालचक्र 
महाकाल का प्रताप प्रलय जब लाता है 
दृश्य सब अदृश्य होते शून्य में विलीन किन्तु 
प्राणों का एक बिंदु सिन्धु बन जाता है 

सृष्टि फिर रिझाती है उस चतुर चितेरे को 
और गुनगुनाती है जीवन का गीत नया