उषा की लाली से उतरी देवी क्या तुम ओमवती हो?
इस सद्यःस्नाता छवि में
तुम सहज सलोनी रूपवती हो
या इस संगम तट पर प्रकटी
गंगा, यमुना, सरस्वती हो?
अर्ध्य दे रही सूर्य देव को,
बिखरे कच लग रही यति हो
सुन्दर धूप रूप यौवन की
तन्वंगी शुची सौम्य सटी हो
राज नल की दमयंती या
रत्नसेन की रूपमती हो?
आख्यानों की अमरबेलि तुम,
दीपशिखा जैसी दिखती हो
सावित्री तुम सत्यवान की
कालजयी अत शीलवती हो
अथवा तुम अनंग से बिछड़ी
एकाकी रम रही रति हो
स्वयं अपर्णा सी काया में
तुम तो जैसे पार्वती हो
कौन गरलपायी शंकर है
किसकी तुम सौभाग्यवती हो
उषा की लाली से उतरी, देवी क्या तुम ओमवती हो?
Thursday, November 19, 2009
Wednesday, November 11, 2009
एक गीत मेरा भी
एक गीत मेरा भी अपने अधरों से तुम छू कर देखो
इसमें तुमको प्रीति-रीति, रस, वाणी को श्रृंगार मिलेगा
मेरे प्राण, ह्रदय की बातें,
तुमसे कहने को तरसे हैं.
उमस भरे, मेरे अंतर के,
पावस घन उमडे बरसे हैं.
चटक, मोर, चकोर, न जाने,
कबसे मेरी बात कह रहे.
इनको सुनो, गुणों, पहचानो तुमको भी अभिसार मिलेगा
मेरी आँखों में झांको तो,
अपनी ही छवि तुम्हे मिलेगी.
विश्वासों का संबल रख लो,
नींव प्यार की नहीं हिलेगी.
शब्द-सुमन की यह वरमाला,
अपने गले लगा कर देखो.
तुमको खरे जल के मोती, सीपों को उदगार मिलेगा
मेरे, तेरे, इसके, उसके
सबके जीवन की परिभाषा
एक दूसरे से मिलजुल कर
सुख पाने वाली अभिलाषा
प्रकृति-पुरुष की रची बसी इस
संसृति को अंचल में भर लो
जन्म-जन्म की प्यास बुझेगी, प्यार भरा आधार मिलेगा
तंत्र, मंत्र, मोहन, उच्चाटन
शब्द-शक्ति प्रेरित होते हैं
व्यथित-ह्रदय के करूँ स्वरों में
विरह-गीत गुप-चुप रोते हैं
तुम कलकंठ कूक कोयल की
हूक पपीहे वाली भर दो
प्रेमी उर की चंचलता को धड़कन का अधिकार मिलेगा
इस छंभंगुर जग में हम तुम,
साथ हमेशा नहीं रहेंगे;
फिर कैसे तुमसे हम अपने,
मन प्राणों की बात कहेंगे
अपने स्वर के गंगाजल से,
शब्द-शब्द अभिसिंचित कर दो
प्राण प्रतिष्ठित होकर इनको अजर-अमर संसार मिलेगा
एक गीत मेरा भी अपने अधरों से तुम छू कर देखो
इसमें तुमको प्रीति-रीति, रस, वाणी को श्रृंगार मिलेगा
इसमें तुमको प्रीति-रीति, रस, वाणी को श्रृंगार मिलेगा
मेरे प्राण, ह्रदय की बातें,
तुमसे कहने को तरसे हैं.
उमस भरे, मेरे अंतर के,
पावस घन उमडे बरसे हैं.
चटक, मोर, चकोर, न जाने,
कबसे मेरी बात कह रहे.
इनको सुनो, गुणों, पहचानो तुमको भी अभिसार मिलेगा
मेरी आँखों में झांको तो,
अपनी ही छवि तुम्हे मिलेगी.
विश्वासों का संबल रख लो,
नींव प्यार की नहीं हिलेगी.
शब्द-सुमन की यह वरमाला,
अपने गले लगा कर देखो.
तुमको खरे जल के मोती, सीपों को उदगार मिलेगा
मेरे, तेरे, इसके, उसके
सबके जीवन की परिभाषा
एक दूसरे से मिलजुल कर
सुख पाने वाली अभिलाषा
प्रकृति-पुरुष की रची बसी इस
संसृति को अंचल में भर लो
जन्म-जन्म की प्यास बुझेगी, प्यार भरा आधार मिलेगा
तंत्र, मंत्र, मोहन, उच्चाटन
शब्द-शक्ति प्रेरित होते हैं
व्यथित-ह्रदय के करूँ स्वरों में
विरह-गीत गुप-चुप रोते हैं
तुम कलकंठ कूक कोयल की
हूक पपीहे वाली भर दो
प्रेमी उर की चंचलता को धड़कन का अधिकार मिलेगा
इस छंभंगुर जग में हम तुम,
साथ हमेशा नहीं रहेंगे;
फिर कैसे तुमसे हम अपने,
मन प्राणों की बात कहेंगे
अपने स्वर के गंगाजल से,
शब्द-शब्द अभिसिंचित कर दो
प्राण प्रतिष्ठित होकर इनको अजर-अमर संसार मिलेगा
एक गीत मेरा भी अपने अधरों से तुम छू कर देखो
इसमें तुमको प्रीति-रीति, रस, वाणी को श्रृंगार मिलेगा
प्रणय वारुणी
इस जीवन में मधुर तिक्त रस जो कुछ मैंने पाया
उसकी अनुपम मंजुल माया प्रणय वारुणी लाया
पुण्य उदय होने पर सबको जीवन साथी मिलता
किंतु प्रेम का पुष्प अचानक भावुक उर में खिलता
सच्चा प्यार सुदृढ़ बरगद सा नही हिलाए हिलता
लेकिन दर्द बहुत होता जब घाव पुराना छिलता
भव सागर मैथ कर विष-अमृत जो कुछ मैंने पाया
तुम्हें पिलाने आज उसी की प्रणय वारुणी लाया
नयनो से पीने वालों अब अधरों में रस घोलो
पीडाएं पलती हों उर में फिर भी स्वर में बोलो
भूली बिसरी यादों के कुछ वातायन तो खोलो
कितना प्यार निभाया किसने मन से मन को तोलो
प्रीती-रीति में देखो हमने क्या खोया क्या पाया
सुख सपनो की मनहर छाया प्रणय वारुणी लाया
शैशव बचपन बीत गया जब आयी नई जवानी
आंखों से मिलकर यह आँखें हो बैठी दीवानी
तन का गणित ह्रदय का रूपक रचने लगे कहानी
मैं ख़ुद बाजीराव बन गया वह मेरी मस्तानी
जिसके रुचिकर मृदुल भाव ने जीवन सरस बनाया
उसकी किंचित संचित बूँदें प्रणय वारुणी लाया
वह चंडी के दिन थे अपने सोने की थी रातें
झेल चुके थे जग समाज की हम शतरंजी घातें
समय सलोना बदल गया जब बदल गयी वे बातें
कुछ टूटे कुछ जुड़े रह गए अपने रिश्ते-नाते
जिनके सपनो से मिलती है मन को शीतल छाया
उसकी सुधिया जागृत करने प्रणय वारुणी लाया
कभी कभी अम्बर में जैसे घिरती घनी घटायें
उसी तरह उठती गिरती हैं मेरी भी इच्छाएं
सुख-दुःख आने जाने वाले कब तक साथ निभाएं
इनकी भी तो काल चक्र ने बाँधी हैं सीमायें
किंतु अमर मन के आँगन में मुस्काती जो काया
उसके अधर चषक से छलकी प्रणय वारुणी लाया
उसकी अनुपम मंजुल माया प्रणय वारुणी लाया
पुण्य उदय होने पर सबको जीवन साथी मिलता
किंतु प्रेम का पुष्प अचानक भावुक उर में खिलता
सच्चा प्यार सुदृढ़ बरगद सा नही हिलाए हिलता
लेकिन दर्द बहुत होता जब घाव पुराना छिलता
भव सागर मैथ कर विष-अमृत जो कुछ मैंने पाया
तुम्हें पिलाने आज उसी की प्रणय वारुणी लाया
नयनो से पीने वालों अब अधरों में रस घोलो
पीडाएं पलती हों उर में फिर भी स्वर में बोलो
भूली बिसरी यादों के कुछ वातायन तो खोलो
कितना प्यार निभाया किसने मन से मन को तोलो
प्रीती-रीति में देखो हमने क्या खोया क्या पाया
सुख सपनो की मनहर छाया प्रणय वारुणी लाया
शैशव बचपन बीत गया जब आयी नई जवानी
आंखों से मिलकर यह आँखें हो बैठी दीवानी
तन का गणित ह्रदय का रूपक रचने लगे कहानी
मैं ख़ुद बाजीराव बन गया वह मेरी मस्तानी
जिसके रुचिकर मृदुल भाव ने जीवन सरस बनाया
उसकी किंचित संचित बूँदें प्रणय वारुणी लाया
वह चंडी के दिन थे अपने सोने की थी रातें
झेल चुके थे जग समाज की हम शतरंजी घातें
समय सलोना बदल गया जब बदल गयी वे बातें
कुछ टूटे कुछ जुड़े रह गए अपने रिश्ते-नाते
जिनके सपनो से मिलती है मन को शीतल छाया
उसकी सुधिया जागृत करने प्रणय वारुणी लाया
कभी कभी अम्बर में जैसे घिरती घनी घटायें
उसी तरह उठती गिरती हैं मेरी भी इच्छाएं
सुख-दुःख आने जाने वाले कब तक साथ निभाएं
इनकी भी तो काल चक्र ने बाँधी हैं सीमायें
किंतु अमर मन के आँगन में मुस्काती जो काया
उसके अधर चषक से छलकी प्रणय वारुणी लाया
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