Saturday, February 26, 2011

एक दिवस जीवन का आज और बीत गया

आदि से अनंत की ओर लिए जाता यह
एक दिवस जीवन का आज और बीत गया

जीवन की राहों में भटक रहे प्राणी को 
गिनी-चुनी श्वांसों का संबल मिल पाटा है 
आशा निराशा लिए दुनिया के झमेलों में 
अनुपम पाथेय प्राण प्यारा लुट जाता है 

पता नहीं चलता कब आयु को चुराता हुआ 
ग्रीष्म और पावस फिर शीतकाल बीत गया 

जीवन के दीपक मैं प्राणों का नेह भरे 
श्वांसो की बाती से दीपित तन पलता है 
ज्योति का प्रकाश पुंज मार्ग के अंधेरों में 
कहाँ साथ छोड़ेगा पता नहीं चलता है 

अंतर की धड़कन को गिन रहा प्रत्येक पल 
क्षण भर का वर्तमान होकर अतीत गया 

जीवन का अमृत-कुण्ड बूँद-बूँद टपक-टपक 
रिसते हुए घट का जल जैसे चुक जाता है 
इन्द्रियों की भूख प्यास तन मन का योगदान 
बिना किसी कोलाहल सभी रुक जाता है 

माया के वशीभूत मोह मद तन्द्रा में 
कोई समझ पाता नहीं जीवन कब रीत गया 

जीवन और मृत्यु का अविराम कालचक्र 
महाकाल का प्रताप प्रलय जब लाता है 
दृश्य सब अदृश्य होते शून्य में विलीन किन्तु 
प्राणों का एक बिंदु सिन्धु बन जाता है 

सृष्टि फिर रिझाती है उस चतुर चितेरे को 
और गुनगुनाती है जीवन का गीत नया 

मन का पंछी


मन का पंछी
प्रेम
स्वप्न के पंख लगा कर
दूर क्षितिज पर 
सदा तुम्हारे साथ पला है 
तन का बंदी 
प्राण 
किन्तु पिंजरे में रहकर 
विरह-व्यथा के
अग्नि पुंज में सदा जला है 
नटखट है यह 
ह्रदय 
बसा जो मेरे तन में 
लेकिन रहता सदा तुम्हारा
मुझो सबसे ज्यादा हरदम यही खला है 
किसको दूं मैं 
दोष 
भाग्य को या जीवन को?
इन अपनों ने 
मुझसे मिलकर मुझे छला है  

मुझे है गरल घूँट जिसने पिलाया

मुझे है गरल घूँट जिसने पिलाया
उसे मैं सुधा रस पिलाता रहा हूँ

हमारे प्रणय पंथ पर शूल बन कर
नियति की कड़ी दृष्टि जबसे पड़ी है
न कुछ कम हुई साध प्रिय से मिलन की
नयी शक्ति देने हृदयगति बढ़ी है
बहे घोर झंझा जिधर से डराने
उधर ही कदम मैं बढ़ाता रहा हूँ

रची स्वप्न संसृति मिलन कल्पना ने
बुझाने विरह की तपन को, जलन को
विधाता मगर वाम था स्वप्न में भी
मिला तोष किंचित न मनो को, न तन को
इसी से व्यथा को अमर रूप देने
विरह के मधुर गीत गाता रहा हूँ

किसी के मिलन की प्रतीक्षा अवधि में
नयन सीपियाँ मोतियों को संजोये
विकल हैं चढ़ाने उसी के चरण पर
इन्हें भावना सूत्र में जो पिरोये
असीमित जलन वर्तिका की लिए मैं
सतत शांति का मोद  पाता रहा हूँ

मैं तुम्हें कबसे बुलाता हूँ

मैं तुम्हें कबसे बुलाता हूँ चली आओ  सुनयने
आज जी भर कर तुम्हे मैं प्यार करना चाहता हूँ

आज कुमकुम का सजाये थाल उषा
उतर अम्बर से धरा पर मुस्कुराती
आज गंगा और यमुना की तरंगे
मधु मिलन की विश्वव्यापी गीत गाती
पुण्य-पथ पर दो कदम आगे बढ़ा कर
मैं तुम्हारे प्यार को साकार करना चाहता हूँ

आज संयम के सभी बंधन खुलेंगे
और उच्छ्रिन्खल मिलन होगा हमारा 
सिन्धु की संतप्त लहरों को मिलेगा
आज उनकी साध का स्वप्निल किनारा 
चिर असंभव को रुचिर संभव बनाकर
मैं तुम्हारे प्यार का श्रृंगार करना चाहता हूँ 

टूटते हैं आश के तारे हमारे 
और बाज़ी मात पाती जा रही है 
अब न कल पर रह गया विश्वास मेरा  
ज़िन्दगी को मौत खाती जा रही है
विरह के अभिशाप की दूरी मिटा कर
मैं तुम्हारी प्रीति की मनुहार करना चाहता हूँ

मैं तुम्हे कबसे बुलाता हूँ  चली आओ सुनयने
आज जी भर कर तुम्हे मैं प्यार करना चाहता हूँ  


कौन हूँ मैं ?

कौन हूँ मैं और कबसे हूँ तुम्हारा यह न पूछो

क्योंकि युग-युग से हमारा साथ आजीवन रहा है
'ए' मुझे कहती रही तुम 'ए' तुम्हें मैंने कहा है

यह पहेली वर्ण 'ए' की प्रिय सहेली, स्वयं बूझो
कौन हूँ मैं और कबसे हूँ तुम्हारा, यह न पूछो

रूप जब बदले हमारे साथ 'ए' तब भी रहा है
नाम भी बदले मगर यह वर्ण 'ए' शाश्वत रहा है

स्वस्तिका सा रूप पवन वर्ण 'ए' को आज पूजो
कौन हूँ मैं और कबसे हूँ तुम्हारा, यह न पूछो

धूल में मिलकर सदा ही फूल मधु ऋतू में खिले हैं
बिछुड़ कर हम तुम अचानक भाग्यवश फिर से मिले हैं

अब मुझे पहचान लो तुम. प्रश्नचिन्हों से न जूझो
कौन हूँ मैं और कबसे हूँ तुम्हारा, यह न पूछो

सत्यनिष्ठा की पिपासा तृप्ति भी पाती रही है
घोर तप का स्वप्न, सुरसरी स्वर्ग से उतरी, बही है

आत्माओं के मिलन का मर्म तुम मुझसे न पूछो
कौन हूँ मैं और कबसे हूँ तुम्हारा, यह न पूछो

हनुमत वंदन

ज्ञान के निधान भगवान् अंजनी सपूत
क्षण भर में क्षार करें विपदाएं हंत की
ध्यान के वितान श्रीराम के प्रधान दूत
रोग शोक हरें सभी पीडाएं संत की

ज्ञान के अजान श्रीमान शक्ति में अकूत
गिरिधर की ख्याति भक्ति चर्चा अनन्त की
गान के विहान हनुमान यश कीर्ति सूत
दुःख दैन्य दूर करें व्याधि आदि अंत की

दान में महँ सम्मान के सुजन सेतु
सेवा में लीन सदा सीता के कंत की
भान में प्रधान कांतिवान शुद्ध अवधूत
वज्र अंग ध्यान मग्न शोभा श्रीमंत की

यान के सामान पवमान के प्रसून पूत
पल भर में पार करें दूरियां दिगंत की
मान के निदान स्वाभिमान की सुरक्षा हेतु
आदि से अनन्त है छलांग हनुमंत की

जय श्री गणपति

जय श्री गणपति जयति गणेश
पाहिमाम सुखधाम गणेश

एकदंत गणपति प्रथमेश
पार्वती के सूत अखिलेश
मूषक वाहन शुचि परिवेश
जयति गजानन जय करुणेश

गणाध्यक्ष चर्चित सर्वेश
धूम्रकेतु प्रभु पिता महेश
वक्रतुंड अतिकाय सुरेश
विघ्न विनाशक जय विमलेश

विकत इष्ट सुख शांति निवेश
तम नाशक मुख कांति दिनेश
मोदक प्रिय छवि शुभ सन्देश
जयति विनायक जय भुवनेश

बुद्धिनाथ यश कीर्ति प्रवेश
कवी कुल भूषण स्वस्ति अशेष
सुमुख भक्ति चिर शक्ति धनेश
जय गजवदन जयति लग्नेश

कपिल चतुर्भुज कुंचित केश
कंकुश पाश पद्म कर शेष
आशिर्वादक मंजुल भेष
जय लम्बोदर जयति गणेश

भालचंद्र शोभित गणवेश
ऋद्धि सिद्धि सेवित अनिमेष
दयामूर्ति श्री सहित विशेष
हे गजकर्ण हरो सब क्लेश

जय श्री गणपति जयति गणेश
पाहिमाम सुखधाम गणेश