इस जीवन में मधुर तिक्त रस जो कुछ मैंने पाया
उसकी अनुपम मंजुल माया प्रणय वारुणी लाया
पुण्य उदय होने पर सबको जीवन साथी मिलता
किंतु प्रेम का पुष्प अचानक भावुक उर में खिलता
सच्चा प्यार सुदृढ़ बरगद सा नही हिलाए हिलता
लेकिन दर्द बहुत होता जब घाव पुराना छिलता
भव सागर मैथ कर विष-अमृत जो कुछ मैंने पाया
तुम्हें पिलाने आज उसी की प्रणय वारुणी लाया
नयनो से पीने वालों अब अधरों में रस घोलो
पीडाएं पलती हों उर में फिर भी स्वर में बोलो
भूली बिसरी यादों के कुछ वातायन तो खोलो
कितना प्यार निभाया किसने मन से मन को तोलो
प्रीती-रीति में देखो हमने क्या खोया क्या पाया
सुख सपनो की मनहर छाया प्रणय वारुणी लाया
शैशव बचपन बीत गया जब आयी नई जवानी
आंखों से मिलकर यह आँखें हो बैठी दीवानी
तन का गणित ह्रदय का रूपक रचने लगे कहानी
मैं ख़ुद बाजीराव बन गया वह मेरी मस्तानी
जिसके रुचिकर मृदुल भाव ने जीवन सरस बनाया
उसकी किंचित संचित बूँदें प्रणय वारुणी लाया
वह चंडी के दिन थे अपने सोने की थी रातें
झेल चुके थे जग समाज की हम शतरंजी घातें
समय सलोना बदल गया जब बदल गयी वे बातें
कुछ टूटे कुछ जुड़े रह गए अपने रिश्ते-नाते
जिनके सपनो से मिलती है मन को शीतल छाया
उसकी सुधिया जागृत करने प्रणय वारुणी लाया
कभी कभी अम्बर में जैसे घिरती घनी घटायें
उसी तरह उठती गिरती हैं मेरी भी इच्छाएं
सुख-दुःख आने जाने वाले कब तक साथ निभाएं
इनकी भी तो काल चक्र ने बाँधी हैं सीमायें
किंतु अमर मन के आँगन में मुस्काती जो काया
उसके अधर चषक से छलकी प्रणय वारुणी लाया
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