कौन हूँ मैं और कबसे हूँ तुम्हारा यह न पूछो
क्योंकि युग-युग से हमारा साथ आजीवन रहा है
'ए' मुझे कहती रही तुम 'ए' तुम्हें मैंने कहा है
यह पहेली वर्ण 'ए' की प्रिय सहेली, स्वयं बूझो
कौन हूँ मैं और कबसे हूँ तुम्हारा, यह न पूछो
रूप जब बदले हमारे साथ 'ए' तब भी रहा है
नाम भी बदले मगर यह वर्ण 'ए' शाश्वत रहा है
स्वस्तिका सा रूप पवन वर्ण 'ए' को आज पूजो
कौन हूँ मैं और कबसे हूँ तुम्हारा, यह न पूछो
धूल में मिलकर सदा ही फूल मधु ऋतू में खिले हैं
बिछुड़ कर हम तुम अचानक भाग्यवश फिर से मिले हैं
अब मुझे पहचान लो तुम. प्रश्नचिन्हों से न जूझो
कौन हूँ मैं और कबसे हूँ तुम्हारा, यह न पूछो
सत्यनिष्ठा की पिपासा तृप्ति भी पाती रही है
घोर तप का स्वप्न, सुरसरी स्वर्ग से उतरी, बही है
आत्माओं के मिलन का मर्म तुम मुझसे न पूछो
कौन हूँ मैं और कबसे हूँ तुम्हारा, यह न पूछो
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