मुझे है गरल घूँट जिसने पिलाया
उसे मैं सुधा रस पिलाता रहा हूँ
हमारे प्रणय पंथ पर शूल बन कर
नियति की कड़ी दृष्टि जबसे पड़ी है
न कुछ कम हुई साध प्रिय से मिलन की
नयी शक्ति देने हृदयगति बढ़ी है
बहे घोर झंझा जिधर से डराने
उधर ही कदम मैं बढ़ाता रहा हूँ
रची स्वप्न संसृति मिलन कल्पना ने
बुझाने विरह की तपन को, जलन को
विधाता मगर वाम था स्वप्न में भी
मिला तोष किंचित न मनो को, न तन को
इसी से व्यथा को अमर रूप देने
विरह के मधुर गीत गाता रहा हूँ
किसी के मिलन की प्रतीक्षा अवधि में
नयन सीपियाँ मोतियों को संजोये
विकल हैं चढ़ाने उसी के चरण पर
इन्हें भावना सूत्र में जो पिरोये
असीमित जलन वर्तिका की लिए मैं
सतत शांति का मोद पाता रहा हूँ
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