मैं तुम्हें कबसे बुलाता हूँ चली आओ सुनयने
आज जी भर कर तुम्हे मैं प्यार करना चाहता हूँ
आज कुमकुम का सजाये थाल उषा
उतर अम्बर से धरा पर मुस्कुराती
आज गंगा और यमुना की तरंगे
मधु मिलन की विश्वव्यापी गीत गाती
पुण्य-पथ पर दो कदम आगे बढ़ा कर
मैं तुम्हारे प्यार को साकार करना चाहता हूँ
आज संयम के सभी बंधन खुलेंगे
और उच्छ्रिन्खल मिलन होगा हमारा
सिन्धु की संतप्त लहरों को मिलेगा
आज उनकी साध का स्वप्निल किनारा
चिर असंभव को रुचिर संभव बनाकर
मैं तुम्हारे प्यार का श्रृंगार करना चाहता हूँ
टूटते हैं आश के तारे हमारे
और बाज़ी मात पाती जा रही है
अब न कल पर रह गया विश्वास मेरा
ज़िन्दगी को मौत खाती जा रही है
विरह के अभिशाप की दूरी मिटा कर
मैं तुम्हारी प्रीति की मनुहार करना चाहता हूँ
मैं तुम्हे कबसे बुलाता हूँ चली आओ सुनयने
आज जी भर कर तुम्हे मैं प्यार करना चाहता हूँ
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