मन का पंछी
प्रेम
स्वप्न के पंख लगा कर
दूर क्षितिज पर
सदा तुम्हारे साथ पला है तन का बंदी
प्राण
किन्तु पिंजरे में रहकर
विरह-व्यथा के
अग्नि पुंज में सदा जला है
नटखट है यह
ह्रदय
बसा जो मेरे तन में
लेकिन रहता सदा तुम्हारा
मुझो सबसे ज्यादा हरदम यही खला है
किसको दूं मैं
दोष
भाग्य को या जीवन को?
इन अपनों ने
मुझसे मिलकर मुझे छला है
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